#वैशाली महोत्सव #वैशाली महोत्सव के बारे में #vaishali mahotsav #vaisali mahotsav ke bare men

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भूमिका संत रविदास जी ने भी क्या खूब कहा है- “मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है” जैसे कि हमारे वर्द्धमान, जो अपने कर्म से भगवान महवीर बनें और जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर के रूप में प्रतिष्ठित हुए | अहिंसा परमो धर्म : जैसे उपदेश देकर जनमानस के लिए एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में सामने आए, की पुजनीय, बंदनीय हो गए | ऐसे धरती के लाल के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर प्रत्येक वर्ष वैशाली वासी, वैशाली महोत्सव मनाकर भगावन महाबीर के प्रति अपनी श्रद्धा और आस्था प्रकट करते है और वैशाली वासी बड़े प्यार से कहते है -       हम भगवान महाबीर की शुभ जयंती मनाते है,       हम आस्था भगवान महाबीर के प्रति दिखाते है “ |   वैशाली महोत्सव मनाने की परम्परा की शुरुआत स्वर्गीय जगदीश चंद्र माथुर हाजीपुर के एक तत्कालीन अनुमंडलाधिकारी थे, जिनके हृदय में वैशाली के महत्व और महत्ता की ऐसी अखंड ज्योत जल रही थे, जिसके प्रकाश से अभिभूत होकर वैशाली के प्रति अपनी आस्था को, वैशाली महोत्सव मनाने की परम्परा के रूप में प्रकट कर दिया और वैशाली की मिट्टी की खुश...

#मिलेट्स वर्ष 2023, एक कदम स्वस्थ्य जीवन की ओर | #Millets year 2023, a step towards healthy life.

 


प्रस्तावना

स्वस्थ जीवन के लिए स्वस्थ एवं पोष्टिक आहार का होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि स्वस्थ जीवन की कामना इसके बिना निरर्थक है | ज्वार, बाजरा, रागी, मड़ुवा, सावां, कोदों, कुटकी, कंगनी, चना इत्यादि जैसे मोटे अनाजों में भरपूर मात्रा में उच्च प्रोटीन, फाइबर, विटामिन, लौह तत्त्व, कैल्शियम और मैग्नीशियम इत्यादि खनिज पाये जाते है, जो स्वास्थ्य की हर दृष्टि से हमारे शरीर के लिए उपयोगी माने जाते है | भले ही आज हम गेंहूँ को अपने आहार का अहम हिस्सा मानते है, लेकिन पूर्व के वर्षों में साबुत गेहूँ के आटे से बनी रोटियों को स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम नहीं माना जाता था, इसीलिए गेहूँ और चने के संयुक्त मिश्रण से बने, आटे की रोटियों को खाने की प्रथा का चलन था |

 


ऐसा नहीं है की मिलेट्स कोई आज के जमाने की विकसित मिल है या किसी वैज्ञानिक पद्धति से इसका निर्माण किया गया है,ये तो ऐसे अनाजों की किस्में है, जिसे खाकर हमारे पूर्वज स्वस्थ्य जीवन के लाभ से अभिभूत हुए और कुपोषण ,अनामिया ,मधुमेह इत्यादि जैसे असाध्य रोगों से दूर रहें ,लेकिन हमारी पीढ़ी ना जाने क्यूँ इससे दूर रही या दूर होती गई| जबकि बाजरे को कम उपजाऊं मिट्टी या पानी की कम उपलब्धता वाली जगहों पर भी आसानी से उगाया जा सकता है और लागत से ज्यादा मुनाफा भी पाया जा सकता है |

 

भारत सरकार ने इसी कमी को दूर करने के उदेश्य के साथ वर्ष 2018 को मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाया था, ताकि जन जीवन फिर से मिलेट्स की उपयोगिता को समझे व अपने आहार में मिलेट्स को शामिल कर स्वस्थ्य जीवन की दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित हो सके ,भारत सरकार द्वारा बाजरा के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए अनेकों कदम उठाये है जैसे MSP में बढ़ोतरी , सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बाजरे को शामिल करना , किसानों को इनपुट सब्सिडी और उच्च गुणवत्ता वाले बाजरे की बीज किट प्रदान करना इत्यादि |भारत सरकार की इस पहल की साराहना करते हुए, संयुक्त राष्ट्र ने भारत सरकार के उस प्रस्ताव को भी मंजूर कर लिया, जिसमें भारत सरकार ने वर्ष 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स घोषित करने की पेशकस की थी |

 


वर्ष 2023 को मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाने का उद्देश्य सिर्फ इतना है की हम सब 

मिलेट्स में पाये जाने वाले पोषक तत्वों के बारे जाने और मिलेट्स को अपने आहार 
में शामिल करने के लिए प्रेरित होकर, स्वस्थ्य जीवन की ओर बढ़ सके| 
अगर हम मिलेट्स को अपने आहार का अहम हिस्सा बनाने की ओर आकर्षित होंगे 
तो इसकी खेती पर भी जोर देंगे जिसके परिणाम स्वरूप ऐसी जगहों पर भी बाजरे 
की खेती होने लगेगी ,जहाँ पानी की उपलब्धता कम है या जहां की मिट्टी भी 
उपजाऊं कम है |

निष्कर्ष 
स्वस्थ जीवन के लिए पोष्टिक आहार की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता है 
और पौष्टिक आहार की कमियों को भी छुपाया नहीं जा सकता है | 
जब बाजरे में पाये जाने वाले अनेकों पोषक व पौष्टिक तत्वों से हम अनेकों प्रकार के
रोगों से बचने के साथ – साथ , स्वस्थ्य जीवन की ओर बढ़ सकते है तब बाजरे को
नजरअंदाज करने की कोई ठोस वजह ही शेष नहीं बचती है |
इसीलिए 


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