#वैशाली महोत्सव #वैशाली महोत्सव के बारे में #vaishali mahotsav #vaisali mahotsav ke bare men

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भूमिका संत रविदास जी ने भी क्या खूब कहा है- “मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है” जैसे कि हमारे वर्द्धमान, जो अपने कर्म से भगवान महवीर बनें और जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर के रूप में प्रतिष्ठित हुए | अहिंसा परमो धर्म : जैसे उपदेश देकर जनमानस के लिए एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में सामने आए, की पुजनीय, बंदनीय हो गए | ऐसे धरती के लाल के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर प्रत्येक वर्ष वैशाली वासी, वैशाली महोत्सव मनाकर भगावन महाबीर के प्रति अपनी श्रद्धा और आस्था प्रकट करते है और वैशाली वासी बड़े प्यार से कहते है -       हम भगवान महाबीर की शुभ जयंती मनाते है,       हम आस्था भगवान महाबीर के प्रति दिखाते है “ |   वैशाली महोत्सव मनाने की परम्परा की शुरुआत स्वर्गीय जगदीश चंद्र माथुर हाजीपुर के एक तत्कालीन अनुमंडलाधिकारी थे, जिनके हृदय में वैशाली के महत्व और महत्ता की ऐसी अखंड ज्योत जल रही थे, जिसके प्रकाश से अभिभूत होकर वैशाली के प्रति अपनी आस्था को, वैशाली महोत्सव मनाने की परम्परा के रूप में प्रकट कर दिया और वैशाली की मिट्टी की खुश...

कोरोना महामारी ‘एक संकट जीवन के लिए’ Corona mhamari ' ek sankat jivan ke lie '



कहते है प्रकृति की रचना सरंचना मानव के अनुकुल होने के साथ – साथ मानव हितैषी भी है और संरक्षण प्रदान करने वाली भी है क्योंकि कोई भी जीव तभी अपने जीवन को आगे बढ़ा सकता है जब जीवन बचाने योग्य आधार हो जैसे साँस लेने के लिए भरपूर मात्रा में ओक्सिजन हो , पीने के लिए निर्मल जल हो , फसल उगाने हेतु उपजाऊ मिट्टी हो इत्यादि....

लेकिन इसके आलावा भी हमें किसी और वस्तु की दरकार अपने जीवन को बचाने के लिए महसूस हो सकती है ये हमें समय दर समय समझ में आता है और हम उसे हराने का प्रयास करते है |

लेकिन कोरोना महामारी एक संकट जो जीवन को तवाह ही नहीं पूरी तरह से नष्ट करने के लिए उत्पन्न हुआ जो इतना प्रभावी था कि जीवन से ही जीवन को खतरा होने का डर हमारे मन मस्तिस्क में बैठ गया और जब तक इसका पूर्ण प्रभाव रहा हम घर तक या अपने आप तक ही सिमित रहें .....



ऐसा नहीं है कि ये डर यूँ ही हमारे मन मस्तिस्क में बैठ गया लाखों जिंदगियों को तवाह होता , बर्बाद होता ,खत्म होता देखकर हम भला भयमुक्त कैसे रह सकते थे और ऐसा होना स्वभाविक भी था



खैर अगर हम इस महामारी के उत्पत्ति की दिशा में बिना किसी को इसके लिए जिम्मेदार मानते हुए सोचें तो हम इसे एक दैवीय आपदा या प्रकृति की रचना संरचना को जाने – अनजाने में छेड़ने का प्रतिफल ही मानेंगे..!

हम क्यों प्रकृति की रचना संरचना के साथ छेड़-छाड़ करते है क्या हम अपने शोध के लिए उचित मार्ग के साथ सिलसिलेबार ढंग से आगे बढना भूल गये है या हमारी ये स्थिति हमारे भीतर अतिसिघ्र कुछ ढूंढने की, कुछ पाने की, तीव्र इच्छा के कारण हो गयी है या इसके उत्पत्ति के पीछे कोई और कारण है जिसे अभी तक समझना हमारे लिए मुमकिन नहीं हो पाया है ..

लेकिन जहाँ तक मेरी समझ कहती है बिना किसी कार्य को किये उसका परिणाम सामने नहीं आता है..!

खैर अगर हम महामारी की उत्पत्ति को भी आकस्मिक होने वाली एक घटना मानते हुए इसकी रोकथाम की दिशा में सोचते है तब हमें समझ आता है कि हम अभी भी आकस्मिक होने वाली घटनाओं के रोकथाम के लिए कितने तैयार है ..!

खैर अब हम इस महामारी से भी काफी हद तक निकल गए है और अपने जीवन को सुचारू रूप से जीने की दिशा में अग्रसर है ........ 



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